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रविवार, 3 मई 2009

कहाँ हैं? कहाँ हैं? कहाँ हैं?

जबसे पता चला है कि, मुम्बई मे केवल ४५ प्रतिशत मतदान हुआ, बडीही कोफ्त और उदासी महसूस हो रही है..
सिर्फ़ इसलिए कि लंबा वीक एंड था? इससे अधिक मतदान तो ५ साल पूर्व हुआ था.....
कहाँ हैं, कहाँ हैं, कहाँ, हैं, जिन्हें नाज़ है हिंदपे वो कहाँ हैं?

कहीँ नहीँ? या फिर जब कुछ करनेका वक्त आता है तो holiday resorts मे चले जाते हैं और फिर बुद्धी वादी बनके अपने ड्राइंग रूम्स से डिस्कशन करते हैं...राजनेताओंको गालियाँ देते हैं? अपनी औलादको यही सीख देते हैं, कि, इस दुनियाकी बडेसे बड़ी लोकशाहीके हम कितने बेज़िम्मेदार नागरिक हैं?

मेरे खयालसे, जिन जिन लोगोंने इसवक्त पलायन किया, वो सब आनेवाले, या फिर हो चुके, आतंकी हमलोंके जिम्मेदार हैं..वो सब एक तरहसे आतंकवादियों से शामिल हैं...हाथ मिलाये हुए हैं...उन्हें इस देशकी राजनीती या राजनेताओंको कुछभी कहनेका हक नही...आतंक वादियों से बदत्तर कायर हैं....

चंद महीनों मे हर शहादत भूल गए...जब ये आतंकी हमला हुआ, तभी मैंने लिखा था," ये जज़्बा सलामत रहे.."....तभी लग रहा था, कि, कुछ सभाएँ, कुछ मोर्चे निकाले जायेंगे और फिर हरेक, अगले हमलेतक भूल भाल जायेंगे...करकरे, काम्टे , पांडुरंग...और बरसों से हो रहे अनेको गुमनाम शहीदोंको...इन पलायन वादियों तक इन हमलों की चपेट पोहोंचेगी तबतक, न जाने कितने और मर चुके होंगे...

भारतने/दुनियाने, मुम्बईपे गर्व किया...किनपे गर्व किया? जो शहीद हुए उनपे? या जिन्होंने मोर्चे निकाले उनपे? आज मेरी गर्दन शरमसे झुक रही है...लगता है, अपनी व्यक्तिगत आज़ादीका हम कितना ग़लत इस्तेमाल कर रहे हैं.... सही कहा था चर्चिलने," your freedom ends, where my nose begins"..हमें कितने इख्तियार दिए जाने चाहियें?

जैसे हर शेहेरके exitpe टोल भरना पड़ता है और अगले टोल पे परची दिखानी होती है, मतदान के दिन, गर उन्गलीपे निशान न हो...और मतदान करनेकी परची ना हो तो, शेहेरके बाहर नही जाने देना चाहिए...या फिर हर exitpe वोटिंग बूथ होने चाहियें...कुछ तो इलाज होगा....वही बात...सीधी ऊँगली से घी ना निकले तो तेढीसे निकालो..पर निकालना ज़रूर है...इन भगौडों की ग़लतीकी सज़ा मासूम क्यों भुगतें??

या तो कमसे मतदान ऐसे दिन हो जब, एक दिन पूर्व या एक दिन बाद कोई छुट्टी ना हो...
आज मुझे कहते हुए शर्म आ रही है,कि, मुम्बईके तथाकथित , जिम्मेदार नागरिक कितने स्वार्थी निकले...कितने खुदगर्ज़...क्यों इन्हें, इनकी कामकी जगहों पे ज़लील ना किया जाय? जैसे पाठशालाओं मे हाजरी लगती है, क्यों इनकी हाज़री ना ली जाय? क्यों न इनके documents पे दर्ज ना हो,कि, इन्हों ने मतदान नही किया...क्यों न इनके पासपोर्ट ज़प्त किए जाय? क्यों ना इन्हें जेलकी सलाखों के पीछे खड़ा ना किया जाय? कमसे कम १ हफ्तेके लिए...? क्यों ना इनकी उन्गलीपे काली सियाही के बदले लाल सियाही का निशान ना लगाया जाय...जो खूनका प्रतीक हो?

गुरुवार, 23 अप्रैल 2009

जा, उड़ जारे पंछी ! १

(एक माँ का, अपनी दूर रहनेवाली बिटिया से, मूक संभाषण )

याद आ रही है वो संध्या ,जब तेरे पिताने उस शाम गोल्फ से लौटके मुझसे कहा,"मानवी जनवरी के९ तारीख को न्यू जर्सी मे राघव के साथ ब्याह कर ले रही है। उसका फ़ोन आया, जब मै गोल्फ खेल रहा था।"

मै पागलों की भाँती इनकी शक्ल देखती रह गयी! और फिर इनका चेहरा सामने होकरभी गायब-सा हो गया....मन झूलेकी तरह आगे-पीछे हिंदोले लेने लगा। कानोंमे शब्द गूँजे,"मै माँ को लेके कहाँ जानेवाली हूँ?"

तू दो सालकीभी नही थी तब लेकिन जब भी तुझे अंदेसा होता था कि, मै कहीँ बाहर जानेकी तैय्यारीमे हूँ, तब तेरा यही सवाल होता था! तूने कभी नही पूछा," माँ, तुम मुझे लेके कहाँ जानेवाली हो?"
माँ तुझे साथ लिए बिना ना चली जाय, इस बातको कहनेका ये तेरा तरीका हुआ करता था! कहीँ तू पीछे ना छोडी जाय, इस डरको शब्दांकित तू हरवक्त ऐसेही किया करती......

सन २००३, नवेम्बर की वो शाम ..... अपनी लाडली की शादीमे जानेकी अपनी कोईभी संभावना नही है, ये मेरे मनमे अचनाकसे उजागर हुआ....
"बाबुल की दुआएँ लेती जा..." इस गीतकी पार्श्व भूमीपे तेरी बिदाई मै करनेवाली थी.... मुझे मालूम था, तू नही रोयेगी, लेकिन मै अपनी माँ के गले लग खूब रो लेनेवाली थी.....

मुझे याद नही, दो घंटे बीते या तीन, पर एकदमसे मै फूट-फूटके रोने लगी.... फिर किसी धुंद मे समाके दिन बीतने लगे..... किसी चीज़ मे मुझे दिलचस्पी नही रही। यंत्र की भाँती मै अपनी दिनचर्या निभाती....
८ जनवरी के मध्यरात्री मे मेरी आँख बिना किसी आवाज़ के खुल गयी। घडीपे नज़र पडी और मेरे दोनों हाथ आशीष के लिए उठ गए..... शायद इसी पल तेरा ब्याह हो रहा हो!! आँखों मे अश्रुओने भीड़ कर दी.......

तेरे जन्मसेही तेरी भावी ज़िंदगीके बारेमे कितने ख्वाब सँजोए थे मैंने!! कितनी मुश्किलों के बाद तू मुझे हासिल हुई थी,मेरी लाडली!
मै इसे नृत्य-गायन ज़रूर सिखाऊँगी, हमेशा सोचा करती.... ये मेरी अतृप्त इच्छा थी!
तू अपने पैरोंपे खडी रहेगीही रहेगी। जिस क्षेत्र मे तू चाहेगी , उसी का चयन तुझे करने दूँगी। मेरी ससुरालमे ऐसा चलन नही था। बंदिशें थी, पर मै तेरे साथ जमके खडी रहनेवाली थी। मानसिक और आर्थिक स्वतन्त्रता ये दोनों जीवन के अंग मुझे बेहद ज़रूरी लगते थे, लगते हैं।

छोटे, छोटे बोल बोलते-सुनते, न जाने कब हम दोनोंके बीच एक संवाद शुरू हो गया। याद है मुझे, जब मैंने नौकरी शुरू की तो, मेरी पीछे तू मेरी कोई साडी अपने सीनेसे चिपकाए घरमे घूमती तथा मेरी घरमे पैर रखतेही उसे फेंक देती!!
तेरी प्यारी मासी जो उस समय मुंबई मे पढ़ती थी, वो तेरे साथ होती,फिरभी, मेरी साडी तुझसे चिपकी रहती!
तू जब भी बीमार पड़ती मेरी नींदे उड़ जाती। पल-पल मुझे डर लगता कि कहीँ तुझे किसीकी नज़र न लग जाए...

तू दो सालकी भी नही हुई थी के तेरे छोटे भी का दुनियामे आगमन हुआ। याद है तुझे, हम दोनोंके बीछ रोज़ कुछ न कुछ मज़ेकी बात हुआ करती?
तू ३ सालकी हुई और तेरी स्कूल शुरू हुई। मुम्बई की नर्सरीमे एक वर्ष बिताया तूने। तेरे पिताके एक के बाद एक तबादलों का सिलसिला जारीही रहा। बदलते शहरों के साथ पाठशालाएँ बदलती रही.....
अपनी उम्रसे बोहोत संजीदा, तेज़ दिमाग और बातूनी बच्ची थी तू। कालांतर से , मुझे ख़ुद पता नही चला,कब, तू शांत और एकान्तप्रिय होती चली गयी। बेहद सयानी बन गई। मुझे समझाही नही या समझमे आता गया पर मै अपने हालत की वजहसे कुछ कर न सकी.....
आज मुझे इस बातका बेहद अफ़सोस है....... क्या तू, मेरी लाडली, अल्हड़तासे अपना बचपन, अपनी जवानी जी पायी?? नही न??मेरी बच्ची, मुझे इस बातका रह-रहके खेद होता है। मै तेरे वो दिन कैसे लौटाऊ ??

मेरी अपनी ज़िंदगी तारपरकी कसरत थी। उसे निभानेमे तेरी मुझे पलपल मदद हुई। मैही नादान, जो ना समझी। बिटिया, मुझे अब तो बता, क्या इसी कारन तुझे एकाकी, असुरक्षित महसूस होता रहा??

जबसे मै कमाने लगी, चाहे वो पाक कलाके वर्ग हों, चाहे अपनी कला हो या जोभी ज़रिया रहा,मिला, मैंने तिनका, तिनका जोड़ बचत की। तुम बच्चों की भावी ज़िंदगी के लिए, तुम्हारी पढ़ाई के लिए, किसी तरह तुम्हारी आनेवाली ज़िंदगी आर्थिक तौरसे सुरक्षित हो इसलिए....... ज़रूरी पढ़ाई की संधी हाथसे निकल न जाय इसकारण ....... तुम्हारा भविष्य बनानेकी अथक कोशिशमे मैंने तुम्हारे, ख़ास कर तेरे, वर्तमान को दुर्लक्षित तो नही किया?

ज़िंदगी के इस मोड़ से मुडके देखती हूँ तो अपराध बोधसे अस्वस्थ हो जाती हूँ। क्या यहीँ मेरी गलती हुई? क्या तू मुझे माफ़ कर सकेगी? पलकोंमे मेरी बूँदें भर आती हैं, जब मुझे तेरा वो नन्हा-सा चेहरा याद आता है। वो मासूमियत, जो संजीदगीमे न जानूँ कब तबदील हो गयी....!
अपने तनहा लम्होंमे जब तू याद आती है, तो दिल करता है, अभी उसी वक्त काश तुझे अपनी बाहोँ मे लेके अपने दिलकी भडास निकाल दूँ!!निकाल सकूँ!!मेरी बाहें, मेरा आँचल इतना लंबा कहाँ, जो सात समंदर पार पोहोंच पाये??ना मेरी सेहत ऐसी के तेरे पास उड़के चली आयूँ!!नाही आर्थिक हालात!!अंधेरी रातोंमे अपना सिरहाना भिगोती हूँ। जब सुबह होती है, तो घरमे झाँकती किरनों मे मुझे उजाला नज़र नही आता....जहाँ तेरा मुखडा नही, वो घर मुझे मेरा नही लगता...गर तू स्वीकार करे तो अपनी दुनियाँ तुझपे वार दूँ मेरी लाडली!
क्रमशः

3 टिप्पणियाँ:

Mired Mirage said...

शमा जी,अच्छा किया आपने अपने मन के उद्गार बाहर निकालने की राह चुनी। यहाँ आपको बहुत से मित्र मिलेंगे,जो आपकी बात समझेंगे भी,सलाह भी देंगे व कभी कभी आपको आपकी किसी सोच को बदलने को भी उकसाएँगे। सबसे बड़ी बात यह है कि जब हम अपनी सोच को लिखित शब्दों में उड़ेलते हैं तो बहुत सी बातें अपने आप ही हमें अधिक साफ होकर नजर आने लगती हैं। यहाँ आकर हमें यह भी महसूस होता है कि दुख में हम अकेले नहीं हैं,सब हमारे साथ हैं और हम अकेले दुखी नहीं हैं। सुख में भी हमारी खुशी में खुश होने वाले बहुत से मिल जाते हैं।
आपका यहाँ स्वागत है।
घुघूती बासूती

Udan Tashtari said...

माँ का ममत्व-बहुत बढ़िया लिख रहीं हैं आप-हमें इन्तजार रहता है आपके लेखन का.

DR.ANURAG said...

हम तो खैर हमेशा से इस बात के खास पक्षधर रहे है की साहित्य लेखन हो या गैर पेशेवर लेखन हो बस पढने वाले को उससे जुडाव महसूस होना चाहिए ..ओर उसकी ढेर सारी खासियत आप में नजर आती है....लिखती रहे....

रोयीं आँखें मगर...१

रोई आँखें मगर.......

मई महीनेकी गरमी भरी दोपहर थी.... घर से कही बाहर निकलने का तो सवालही नही उठता था।....सोचा कुछ दराजें साफ कर लू। कुछ कागजात ठीकसे फाइलोमे रखे जाएँ तो मिलनेमे सुविधा होगी....

मैं फर्शपे बैठ गई और अपने टेबल की सबसे निचली दराज़ खोली। एक फाइलपे लेबल था,"ख़त"। उसे खोलके देखने लग गई और बस यादोंकी नदीमे हिचकोले खाने लगी......वो दिन १५ मई का था .......दादाजीका जन्म दिन....!!!

पहलाही ख़त था मेरे दादाजीका...... बरसों पहले लिखा हुआ!!!पीलासा....लगा,छूनेसे टूट ना जाय!! बिना तारीख देखे,पहलीही पंक्तीसे समझ आया कि , ये मेरी शादीके तुरंत बाद उन्होंने अपनी लाडली पोतिको लिखा था!! कितने प्यारसे कई हिदायतें दी थी!!
"खाना बनते समय हमेशा सूती साड़ी पहना करो...."!"बेटी, कुछ ना कुछ व्यायाम ज़रूर नियमसे करना....सेहेतके लिए बेहद ज़रूरी है....."!
मैंने इन हिदायतोको बरसों टाल दिया था........ पढ़ते,पढ़ते मेरी आँखें नम होती जा रही थी.....औरभी उनके तथा दादीके लिखे ख़त हाथ लगे...बुढापे के कारन काँपते हाथोँ से लिखे हुए..... जिनमे प्यार छल-छला रहा था!!
ये कैसी धरोहर अचानक मेरे हाथ लग गई,जिसे मैं ना जाने कब भुला बैठी थी!!ज़हन मे सिर्फ़ दो शब्द समा गए ..."मेरा बाबुल"..."मेरा बचपन"!!

बाबुल.....इस एक लफ़्ज़्मे क्या कुछ नही छुपा? विश्वास,अपनत्व,बचपना,और बचपन,किशोरावस्था और यौवन के सपने,अम्मा-बाबाका प्यार, दादा-दादीका दुलार,भाई-बेहेनके खट्टे मीठे झगडे,सहेलियों के साथ बिताये निश्चिंत दिन..... खेले हुए खेल, सावनके झूले, रची हुई मेहँदी, खट्टी इमली और आम....... सायकल सीखते समय गिरना, रोना, और सँभालना,......बीमारीमे अम्मा या दादीको अपने पास से हिलने ना देना...... उनसे कई बार सुनी कहानियाँ बार-बार सुनना, लकडी के चूल्हेपे बना खाना और सिकी रोटियाँ....... लालटेन के उजालेमे की गई पढाई..... क्योंकि मेरा नैहर तो गाँव मे था...बल्कि गाँवके बाहर बने एक कवेलू वाले घरमे .....जहाँ मेरे कॉलेज जानेके बाद किसी समय बिजली की सुविधा आई थी...
सुबह रेहेट्की आवाज़से आँखें खुलती थी। रातमे पेडोंपे जुगनू चमकते थे और कमरोंमेभी घुस आते थे जिसकी वजहसे एक मद्धिम-सी रौशनी छाई रहती।
अपूर्ण

3 टिप्पणियाँ:

Udan Tashtari said...

कई बार पुरानी यादों में खो जाना अच्छा लगता है.

शायदा said...

आप खु़शकि़स्‍मत हैं कि आपके पास एक ऐसा ख़त है जिसमें प्‍यार और वात्‍सल्‍य छलक रहा है, संभालकर रखिए इसे क्‍योंकि आने वाली जैनरेशन्‍स के पास ऐसे ख़त कहां होंगे....।

उन्मुक्त said...

यह कहानी है कि सत्य कथा?

1 comments:

विनय said...

सच ऐसा कोई ख़त किसी ज़िन्दगी का अविस्मरणीय पल हो सकता है

रोयीं आँखें मगर...२

रोई आँखे मगर....2

दादा मेरे साथ खूब खेला करते थे। वो मेरे पीछे दौड़ते और हम दोनों आँखमिचौली खेलते। मैं पेडोंपे चढ़ जाया करती और वो हार मान लेते। सायकल चलाना उन्ह्नोनेही मुझे सिखाया और बादमे कारभी.....और सिखाई वक्त की पाबंदी, बडोंकी इज्ज़त करना और हमेशा सच बोलना, निडरता से सच बोलना। बाकी घरवालोनेभी यही सीख दी। हम गलतीभी कर बैठते, लेकिन उसे स्वीकार लेते तो डांट नही बल्कि पीठ्पे थप-थपाहट मिलती। निडरता से सच बोलनेकी सीखपे चलना मुश्किल था। कई बार क़दम डगमगा जाते, झूठ बोलके जान बचा लेनेका मोह होता, लेकिन हमेशा दादा याद आते,उनके बोल याद आते की जब कोई इंसान मृत्युशय्या पे हो तो उसके दिलमे कोई पश्चाताप नही होना चाहिए।
इसी बातपे मुझे बचपन की एक घटना याद आयी। हम तीनो भाई-बेहेन स्टेट ट्रांसपोर्ट की बस से स्कूल आया जाया करते थे। एक दिन माँ ने हिदायत देके स्कूल भेजा मुझे की शामको शायद हमारी कार शेहेर आयेगी। अगर एक विशिष्ट जगह्पे कार दिखे तो छोटे भाईको बस स्टेशन पे ठीक से देख लेना तथा उसे साथ लेके आना। ना जाने क्यों, उस भीड़ भरी जगह्पे मैंने बोहोतही सरसरी तौरसे नज़र दौडाई और कारमे बैठ के घर आ गयी। माँ के पूछ्नेपे कहा की, मैंने तो ठीकसे देखा, राजू वहाँ नही था। माँ को शंका हुई की कही बेटा किसी बुरी संगतमे तो नही पड़ गया??जब देर शाम भाई बस से घर लौटा तो माँ ने उससे सवाल किया की वो शाम को बस स्टेशन पे नही था ...कहाँ गया था??उसने बताया की, वो तो बस स्टेशन पे ही था। माने उसे चांटा लगाया। उसने मासे कहा,"माँ तुम चाहो तो मुझे मारो,लेकिन मैं वहीं पे था...बल्कि मैंने दीदी को देखाभी....इससे पहले की मैं उनतक जाता,वो चली गयी...."। माने मेरी तरफ़ मुखातिब होके कहा,"तुमने राजूको ठीकसे देखा था?"
मेरी निगाहें झुक गयी। मुझे अपने आपपे बेहद शर्मिन्दगी महसूस हुई। आजभी जब वो घटना याद आती है तो मेरी आँखें भर आती हैं।
एकबार दादा से रूठ्के मैं पैदलही स्कूल निकल पडी। तब मेरी उम्र होगी कुछ दस- ग्यारह सालकी। स्कूल तकरीबन आठ किलोमीटर दूर था। दादाजीने अपनी सायकल उठायी और मेरे साथ-साथ चलने लगे। क़रीब दो-तीन किलोमीटर चल चुके तो एक बस आयी। बसका चालक दादाजीको जानता था। उसने मुझसे बसमे बैठने के लिए खूब मनुहार की ,लेकिन मैं थी की रोती जा रही थी,और अपनी ज़िद्पे अडी हुई थी। अन्तमे दादाजीने उसे जानेके लिए कह दिया। मैं पैदल चलकेही स्कूल पोहोंची।जब शाम मे स्कूल छूटी तो मैं बस स्टेशन के लिए निकल पडी। थोडीही दूरपे एक छोटी-सी पुलियापर दादाजी मेरा इंतज़ार कर रहे थे!!दिनभर के भूके-प्यासे!!बोले,"अब तुझे बसमे बिठाके मैं सायकल से घर आऊँगा।" मुझे आजतक इस बातपे ग्लानी होती है....काश.....काश,मैं इतनी जिद्दी ना बनी होती....!
अपूर्ण

2 टिप्पणियाँ:

Udan Tashtari said...

अच्छा लग रहा है आपके संस्मरण सुनना/ जारी रहें.

mamta said...

कभी-कभी जिंदगी मे ऐसा होता है।

रोयीं आँखें मगर....३

रोई आँखे मगर....3

मुझे गर्मियोंकी छुट्टी की वो लम्बी-लम्बी दोपहारियाँ याद है, जब हम बच्चे ठंडक ढूँढ नेके लिए पलंगके नीचे गीला कपड़ा फेरकर लेटते थे। कभी कोई कहानीकी किताब लेकर तो कभी ऐसेही शून्यमे तकते हुए। चार साढे चार बजनेका इंतज़ार करते हुए जब हमे बाहर निकलनेकी इजाज़त मिलती। मेरी दादीको उनके भाईने एक केरोसीनपे चलनेवाला फ्रिज दिया था। वे हमारे लिए कुछ ठंडे व्यंजन बनाती, उनमेसे एकको "दूधके फूल" कहती। फ्रिजमे दूध-चीनी मिलके जमती और फिर उसे खूब फेंटती जाती, उसका झाग हमारे गिलासोंमे डालती और खालिहानसे लाई गेहुँकी "स्ट्रा" से हम उसे पीते। खेतमे बहती नेहरमे डुबकियाँ लगाते,आमका मौसम तो होताही। माँ हमे आम काटके देती और नेहरपे बनी छोटी-सी पुलियापे बिठा देती। हमलोग ना जाने कितने आम खा जाते!!तब मोटापा नाम की चीज़ पता जो ना थी!!
माँ और दादी हम दोनों बेहनोके लिए सुंदर-सुंदर कपड़े सिया करती। दादी द्वारा मेरे लिए कढाई करके सिला हुआ एक frock अब भी मैंने सँभाल के रखा है!!
छुट्टी के दिन,जैसे के हर रविवार को, माँ आवला, रीठा तथा सीकाकायी से हमारे बाल धोती।फिर लोबानदान मे जलते कोयलोंपे बुखुर और अगर डालके उसके धुएँसे हमारे बाल सुखाती। उसकी भीनी-भीनी खुशबू आजभी साँसोंमे रची-बसी है।

यादोंकी नदीमे जब घिरके हम हिचकोले खाते हैं, तो उसका कोई सिलसिला नही होता। जिस दिन जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु हुई थी, मुझे याद है,उनकी अन्तिम यात्राका आँखों देखा हाल आकाशवाणी पे सुनके मैं जारोज़ार रोई...कमेंटेटर के साथ-साथ...... उस दिन भयानक तूफान आया था। हमारे खेतके पुराने,पुराने पेड़ उखड के गिर पड़े थे, मोटी,मोटी डालें टूट गयी थी, मानो सम्पूर्ण निसर्ग मातम मना रहा हो। ये तूफान पूरे देशमे आया था उस दिन।
औरभी कैसी -कैसी यादें उमड़ रही हैं!!जब कॉलेज की पढाई के लिए मैं गाँव छोड़ शहर गयी तो दादीअम्मा के कंप कपाते होंठ और आँखों से बहता पानी याद आ रहा है।याद आ रही उनकी बताई एक बडीही र्हिदयस्पर्शी बात.....
जब मैं केवल तीन सालकी थी, तब मेरे पिता आन्ध्र मे फलोंका संशोधन करनेके लिए मेरे और माके साथ जाके रहे थे। हम तीनो चले तो गए,लेकिन किसी कारन कुछ ही महीनोमे लौटना पडा।
जब मैं थोडी बड़ी हुई तो दादीअम्मा ने बताया कि, हम लोगोंके जानेके बाद वे और दादाजी सूने-से बरामदेमे बैठ के एक दूसरेसे बतियाते थे और कहते थे अगर ये लोग लौट आए तो मैं मेरी पोती को गंदे पैर लेके पलंग पे चढ़ने के लिए कभी नही गुस्सा करूँगा , ....इन साफ सुथरी चद्दरों से तो वो छोटे-छोटे, मैले, पैरही भले!!घर के कोने-कोनेसे उसकी किलकारियाँ सुनायी पड़ती हैं.....!!!
क्रमशः

बुधवार, 22 अप्रैल 2009

रोयीं आँखें मगर....४

रोई आँखे मगर.....4

दादीअम्मा जब ब्याह करके अपनी ससुराल आई,तो ज्यादा अंग्रेज़ी पढी-लिखी नही थी, लेकिन दादाके साथ रहते,रहते बेहद अच्छे-से ये भाषा सीख गयीं। इतनाही नही, पूरे विश्वका इतिहास-भूगोलभी उन्होंने पढ़ डाला। हमे इतने अच्छे से इतिहास के किस्से सुनाती मानो सब कुछ उनकी आँखोंके सामने घटित हुआ हो!
उनके जैसी स्मरण शक्ती विरलाही होती है। उर्दू शेरो-शायरीभी वे मौका देख, खूब अच्छे से कर लेती। दादा-दादी मे आपसी सामंजस्य बोहोत था। वे एकदूसरे का पूरा सम्मान करते थे और एक दूसरेकी सलाह्के बिना कोई निर्णय नही लेते।
जब मैने आंतर जातीय ब्याह करनेका निर्णय लिया तो, एक दिन विनय के रहते उन्होंने मुझे अपने पास लेकर सरपे हाथ फेरा और सर थपथपाया........ मानो कहना चाह रहे हों, काँटा भी ना चुभने पाये कभी, मेरी लाडली तेरे पाओंमे, और तब मैने चुनी राह पर कितने फूल कितने काँटें होंगे,ये बात ना वो जानते थे ना मैं! फ़िर उन्होंने विनयजीका हाथ अपने हाथोंमे लिया और देर तक पकड़े रखा, मानो उनसे आश्वासन माँग रहे हों कि, तुम इसे हरपल नयी बहार देना........

मेरी दादी badminton और लॉन टेनिस दोनों खेलती थीं। एक उम्र के बाद उन्हें गठियाका दर्द रेहनेके कारण ये सब छोड़ना पडा। मेरे ब्याह्के दो दिन पहले मैने हमारे पूरे खेतका एक चक्कर लगाया था। वहाँ उगा हर तिनका, घांसका फूल, पेड़, खेतोंमे उग रही फसलें मैं अपने ज़हेन मे सदाके लिए अंकित कर लेना चाहती थी। लौटी तो कुछ उदास-उदास सी थी। दादीअम्माने मेरी स्थिती भांप ली। हमारे आँगन मे badminton कोर्ट बना हुआ था। मुझसे बोलीं,"चल हम दोनों एकबार badminton खेलेगे।"
उस समय उनकी उम्र कोई चुराहत्तर सालकी रही होगी। उन्होंने साडी खोंस ली, हम दोनोने racket लिए और खेलना शुरू किया। मुझे shuttlecock जैसे नज़रही नही आ रहा था। आँखोके आगे एक धुंद -सी छा गयी थी।हम दोनोने कितने गेम्स खेले मुझे याद नही, लेकिन सिर्फ़ एक बार मैं जीती थी।

उनमे दर्द सहकर खामोश रेहनेकी अथाह शक्ती थी। उनके ग्लौकोमा का ओपरेशन कराने हम पती-पत्नी उन्हें हमारी पोस्टिंग की जगाह्पे ले आए। वहाँ औषध -उपचार की बेहतर सुविधाएँ उपलब्ध थी। दादी की उम्र तब नब्बे पार कर चुकी थी, इसलिए सर्जन्स उन्हें जनरल अनेस्थिशिया नही देना चाहते थे। केवल लोकल अनेस्थेशिया पे सर्जरी की गयी। मेरे पतीभी ऑपरेशन थिअटर मे मौजूद थे। दादीअम्माने एक दो बार डॉक्टर से पूछा ,"और कितनी देर लगेगी?"
डॉक्टर हर बार कहते,"बस, और दस मिनिट्स..."
अंत मे वो बोली,"आप तो घंटें भरसे सिर्फ़ दस मिनिट कह रहे हैं!!"

खैर, जब ऑपरेशन पूरा हुआ तो पता चला कि , लोकल अनेस्थिशिया का उनपे कतई असर नही हुआ था! सर्जन्स भी उनका लोहा मान गए। जब दूसरी आँख की सर्जरी थी तब भी वे मुझसे सिर्फ़ इतना बोली,"बेटा, इस बार जनरल अनेस्थिशिया देके सर्जरी हो सकती है क्या? पहली बार मुझे बोहोत दर्द हुआ था"!
बस, इसके अलावा उनको हुई किसी तकलीफ का उन्होंने कभी किसी से ज़िक्र नही किया।
क्रमशः

2 टिप्पणियाँ:

ajay kumar jha said...

shama jee,
sadar abhivaadan. aaj pehlee baar hee apko padhaa aur yakeen maaniye apne kafee prabhaavit kiya . likhtee rahein

Udan Tashtari said...

जारी रहिये, पढ़ रहे हैं.

रोई आँखें मगर...५ (अन्तिम)

रोई आँखें मगर....5

मेरे ब्याह्के कई वर्षों बाद एक बार मैं अपने मायके आई थी कुछ दिनोके लिए। शयनकक्ष से बाहर निकली तो देखा बैठक मे दादाजी के साथ एक सज्जन बैठे हुए थे। दादा ने झट से कहा,"बेटा, इन्हे प्रणाम करो!'
मैंने किया और दादाजी से हँसके बोली,"दादा अब मेरी उम्र चालीस की हो गई है! आप ना भी कहते तो मैं करती!"
दादा कुछ उदास,गंभीर होके बोले,"बेटा, मेरे लिए तो तू अब भी वही चालीस दिनकी है, जैसा की मैंने तुझे पहली बार देखा था, जब तुझे लेके तेरी माँ अपने मायके से लौटी थी....!!"
मेरे दादा -दादी गांधीवादी थे। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम मे भाग लिया था तथा जब गांधीजी ने युवा वर्ग को ललकारा की वे ग्राम सुधार मे तथा ग्राम जागृती मे लग जाएं, तो दोनों मुम्बई का मेहेलनुमा,संगेमरमर का पुश्तैनी मकान छोड़ गाँव आ बसे और खेती तथा ग्राम सुधार मे लग गए। गाँव मे कोई किसी भी किस्म की सुविधा नही थी। दोनों को जेलभी आना जाना पड़ता था, इसलिए उन्होंने उस ज़मानेमे परिवार नियोजन अपनाकर सिर्फ़ एकही ऑलाद को जन्म दिया, और वो हैं मेरे पिता। मुझे मेरे दादा-दादी पे बेहद गर्व रहा है। उन्हें लड़कीका बड़ा शौक़ था। मेरे जन्म की ख़बर सुनके उन्हों ने टेलेग्राम वालेको उस ज़मानेमे, खुश होके १० रुपये दे दिए!!वो बोला ,आपको ज़रूर पोता हुआ होगा!!
उनके अन्तिम दिनोंके दौरान एकबार मैं अपने पीहर गयी हुई थी। अपनी खेती की जगह जो एकदम बंजर थी(उसके छायाचित्र मैंने देखे थे),उसको वाकई उन्होंने नंदनवन मे परिवर्तित कर दिया था। एक शाम उन्होंने अचानक मुझसे एक सवाल किया,"बेटा, तुझे ये जगह लेनेका मेरा निर्णय कैसा लगा?"
ना जाने मेरे दिलमे उस समय किस बातकी झुन्ज्लाहट थी,मैं एकदमसे बोल पडी,"निर्णय कतई अच्छा नही लगा, हमे स्कूल आने जाने के लिए कितने कष्ट उठाने पड़ते थे, और...."ना जाने मैंने क्या-क्या बक दिया। वे बिलकूल खामोश हो गए। मुझे तुरंत उनकी क्षमा मांगनी चाहिए थी, लेकिन मैंने ऐसा नही किया...

दूसरे दिन मैं वापस लौट गयी। उन दिनों हमलोग मुम्बई मे थे। बादमे मैंने सोचा, उन्ह्ने एक माफी का ख़त लिख दूँगी.... लिखा भी.... लेकिन पोस्ट किया उसी दिन उनके देहान्तकी ख़बर आयी..... जिस व्यक्ती ने मेरे लिए इतना कुछ किया था, उसी व्यक्ती को मैंने उनके अन्तिम समयमे ऐसे कटु शब्द सुना दिए! क्या हासिल हुआ मुझे!मैं अपनी ही निगाहोंमे ख़ुद गिर गयी.....

जबतक हमलोग मेरे पीहर पोहोंचे, उनकी अर्थी उठ चुकी थी। वे बेहद सादगी से अपना अन्तिम कार्य करना चाहते थे। अपने लिए खादी का कफ़न दोनोहीने पहलेसे लेके रखा हुआ था.....
पर जब शेहेर और गाँव वालों को उनके निधन की वार्ता मिली, तो सैकडों लोग इकट्ठा हो गए। हर जाती-पाती के लोगोंने कान्धा दिया। एक नज्म है,"मधु" के नामसे लिखनेवाले शायर की, जो दादी सुनाया करती थी,"मधु"की है चाह बोहोत, मेरी बाद वफात ये याद रहे,खादीका कफ़न हो मुझपे पडा, वंदेमातरम आवाज़ रहे,मेरी माता के सरपे ताज रहे"।
उनकी मृत्यु जिस दिन हुई, वो उनकी शादी की ७२वी वर्ष गाँठ थी। जिस दिन उन दोनों का सफर साथ शुरू हुआ उसी दिन ख़त्म भी हुआ.....
मेरी दादी के मुँह से मैंने, उनकी अपनी जिन्दगीके बारेमे कभी कोई शिकायत नही सुनी। मेहेलसे आ पोहोंची एक मिट्टी के घरमे, जहाँ पानी भी कुएसे भरके लाना होता था......ना वैद्यकीय सुविधाएँ,ना कोई स्कूल,ना बिजली....अपने इकलौते बेटेको सारी पढाई होने तक दूर रखना पड़ा। उन्हें राज्यसभाका मेंबर बननेका मौक़ा दिया गया,लेकिन उन्होंने अपने गाँव मेही रहना चाहा।
दादाजी के जानेके बाद दो सालके अन्दर-अन्दर दादी भी चल बसी। जब वे अस्पतालमे थी, तब एकदिन किसी कारण, ५/६ नर्सेस उनके कमरेमे आयी। उन्होंने दादी से पूछा," अम्मा आपको कुछ चाहिए?"
दादी बोली," मुझे तुम सब मिलके 'सारे जहाँसे अच्छा,हिन्दोस्ताँ हमारा',ये गीत सुनाओ!"

सबने वो गीत गाना शुरू किया। गीत ख़त्म हुआ और दादी कोमा मे चली गयी। उसके बाद उन्हें होश नही आया।

इन दोनोने एक पूरी सदी देखी थी। अब भी जब मैं पीहर जाती हूँ तो बरामदेमे बैठे वो दोनों याद आते हैं। एक-दूजे को कुछ पढ़ के सुनाते हुए, कभी कढाई करती हुई दादी, घर के पीतल को पोलिश करते दादा.....मेरी आँखें छलक उठती हैं....जीवन तो चलता रहता है....मुस्कुराके...या कभी दिलपे पत्थर रखके,जीनाही पड़ता है....
पर जब यादें उभरने लगती हैं,बचपनकी,गुज़रे ज़मानेकी तो एक बाढ़ की तरह आतीं हैं.....अब उन्हें रोक लगाती हूँ, एक बाँध बनाके।
समाप्त

4 टिप्पणियाँ:

PD said...

dil ko chhoo lene vali rachana..

अनिल रघुराज said...

लिखते रहिए। ऐसे अनुभवों को सामने लाना जरूरी है। बहुतों को अपना अतीत याद आएगा, किस्से याद आएंगे, हकीकत याद आएगी। अच्छा लिखा है।

DR.ANURAG said...

सच्चे दिल से लिखी हुई एक रचना ..जिसमे आपके अहसास बखूबी झलकते है...लिखती रहे.....

Udan Tashtari said...

पूरे बहाव के साथ बहे पूरी श्रृंख्ला में. जीवन तो चलता रहता है-बस यही मूल मंत्र है.

भारतीय बुनकरोंकी धरोहर .....

बुनकरोंकी धरोहर

मैं पिछले कुछ अरसेसे विविध NGOs के साथ मिलके काम कर रहीं हूँ। और कुछ नहीं तो कमसे कम लोक जाग्रुतिका। दुनियामे हमारे बुनकर बेमिसाल हैं। आज हालत ऐसे हो गए हैं, की लोकाश्रयके अभावसे इनपे आत्महत्या की बारी आ गई है। कई बुनकर पिछले ५/६ वर्षोंमे आर्थिक परेशानीके रहते भारतने खो दिए हैं। इन बुनकर तथा हाथसे कढाई करनेवाले अन्य कारीगरों के लिए कई सेवाभावी संस्थाएँ काम कर रहीं हैं। उनमेसे कुछ बेहतरीन कार्य कर रहीं हैं। मिसालके तौरपर SEWA( self employed women's association), दस्तकार, बनास क्राफ्ट , पारम्पारिक टेक्सटाइल, पारम्पारिक कारीगर, कलारक्षा और अन्य कई। मैंने शुरुआत तो ख़ुद अपनेसे की और कई बरसों से उसे अमल्मे ला रही हूँ। अपना कपडा या अन्य वस्त्र तथा जोभी वस्तुएँ ऐसे प्रदर्शनियों मे उपलब्ध होती हैं, मै कभी बड़ी दुकानों से इनकी ख़रीदारी नही करती। सीधा कारीगारसे ख़रीदना चाहती हूँ। मक़सद ये की, उस वस्तू से होनेवाला मुनाफ़ा सीधे उनके हाथ जाय और वे प्रोत्स्ताहित हों। यही वजह है की बरसों से मै केवल हाथ करघेसे बुने वस्त्र पेहेनती आयी हूँ। ऐसीही साडियों मे ली कुछ तस्वीरें यहाँ पोस्ट कर रहीं हूँ। बताना चाहती हूँ, कि कितनी बेमिसाल बुनाई है ये ! केवल सस्ते कपडेके चक्करमे हम परदेसी बुनत का कपडा ना खरीदें, ये मेरी हर किसी से हाथ जोडके बिनती है। और सच पूछो तो ये बुनकर इतना सस्ता बेचते हैं, की उनपे रेहेम आ जाता है ! मै ख़ुद जानती हूँ कि हाथ करघेको बुनाई के लिए तैयार करनेमे कितना समय लगता है...इतना समय बुनाई मेभी नही लगता...उसपे अगर कढ़ाई हो तो सोचिये और कितनी मेहनत लगती होगी !जानकारी की वजह ये कि हाथसे कढ़ाई मै खुदभी करती हूँ !
अन्यत्र " फायबर आर्ट", इस शीर्षक के तहेत, कुछ ऐसी तस्वीरें भी पोस्ट करने जा रही हूँ, जहाँ मेरी कलाके कुछ नमूने सादर किए हैं। 4 टिप्पणियाँ

4 टिप्पणियाँ:

अजित वडनेरकर ने कहा…

अच्छी पोस्ट ।

NirjharNeer ने कहा…

aapka pyiyas sarahneey hai
aap ek prakashpunj ki tarah andheron ko roshni se nahlane ka kaam kar rahii hai ..is kaam mai bhagvaan aapki madad kare har kadam par
apne blog ka background color change karengii to or accha lagega its my opnion ho sakta hai galat ho.

nitin patel ने कहा…
यह पोस्टलेखक के द्वारा निकाल दी गई है.
nitin patel ने कहा…

mainstream se alag mere shahar ke bunkaro ke liye maine bhi kai stories likhi but aapke article se kuch or idia mila hai thanks for such a wonderful article
pls remove word varification