Sunday, May 3, 2009
आईये हाथ उठायें हमभी....
चलो, जब बेहेस छिड़ ही गयी है तो मै कई सारी बातें सामने ले आती हूँ...शुरुमे पढ़ते हुए असम्बद्ध लगें..लेकिन गौर करें...हमने एक नागरिक के तौरपे अपनी जिम्मेदारियाँ कितनी और कैसे निभाईं?
सबसे पहले तो आपका शंका निरसन कर दूँ..." प्रोटेस्ट" आपको अपने नामसे नही देना है...जैसे मतदान गुप्त है, वैसे येभी...आप अपने नियत किए वोटिंग बूथ पे जायें और वहींपे जो अधिकारी हैं, उनसे कहेँ कि, आपको वोट नही देना ,
अपना प्रोटेस्ट दर्ज करना है...बस इतनाही...हमें अपने मुल्क के लिए ५ सालमे एकबार इतना तो कर्नाही चाहिए..आपके पास अब भड़ास जैसा मंच है...आप ज़रूर करें जनजागृति....और प्रोटेस्ट वोटिंग की बात तो पिछले ३ सालों से अखबारों मे आ रही है..गर बूथ पे नियुक्त अधिकारी इस बातसे अनजान बनते हैं, तो अखबारोंमे कई अधिकारियों के फ़ोन दर्ज होते हैं...उनकी सहायता लें...गर हम कुछभी हाथ पैर नही हिलाएंगे तो कैसे बात बनेगी? क्या हमारे अपने घरमे गन्दगी होती है तो हम झाडू पो़छा नही लगाते? तो क्या हमारे देशके लिए इतनाभी नही कर
सकते? तब तो हमें उसके दुष्परिणाम भुगत नही पड़ेंगे!!
एक और बात कहती हूँ....मैंने एक लड़केको अपने ३ घंटे बरबाद करके इस बात का पीछा करते देखा...अत्यन्त व्यस्त युवक है..लेकिन उसने सिर्फ़ बूथपे बैठे अधिकारियों कोही नही, तमाम यंत्रणा को सिरपे उठा लिया...उसका परिणाम ये हुआ,कि क्यू मे खड़े अन्य लोगोंको भी इस सुविधाका पता चला...एक मुहीम-सी शुरू हो गयी....किसीने अपना समय बरबाद होनेके बारेमे एक शब्द नही निकाला...सब उस युवक के साथ हो लिए...अंतमे क्यू मे खड़े, करीब आधेसे अधिक लोगों ने इस जानकारीका फायदा उठाते हुए अपना विरोध दर्ज किया... ये एक सबक सीखनेवाली घटना है....
अब कुछ साल पीछे ले चलती हूँ...expressway बननेवाला था...मुम्बई-पुणे...श्री साद अली, जो डॉ.सालिम अलीकी सगी बेहेनके बेटे थे, ( मेरे बहेद करीबी रिश्तेदार), उन्होंने इस बातका कडा विरोध किया...उनका कहना था, कि, सरकार पब्लिक ट्रांसपोर्ट बेहतर करे...रेल सुविधा बेहतर करे...विमान यात्रा तो थीही...लेकिन लोनावाला-खंडाला की पहाडियाँ और पेड़ ना काटने दे....मौसम बरबाद हो जायेगा...अन्य कई दूरगामी परिणाम होंगे...हर तरहके भागौदोंको ये आसान तरीका मिल जायेगा और पर्यावरण का सत्यानाश...! यही हुआ...इगतपुरी, महाबलेश्वर, और अन्य कई स्थलों पे ना वो पँछी रहे, ना जुगनू, ना वो पूरे साल पड़नेवाली( दिनमे कमसे कम ६/७ बार) पड़नेवाली बौछारें...! मुझे याद है, आज जो पछता रहे हैं, वो सारे लोग उनपे हँसते थे, उनका मजाक उडाते थे...ऐसे तो प्रगतीही रुक जायेगी....!
आज वही लोग इसे अधोगती मानते हैं...हर चुनावके समय लोग एक लंबा वीकएंड मानाने लोनावाला- खंडाला मे बने resorts और और होटल्स का फायदा उठाते हुए भाग निकलते हैं...ऐसा मौक़ा उन्हें चुनाव के दौरान ख़ास मिल जाता है...अपनी औलादकोभी वो यही गैर ज़िम्मेदाराना वर्तन सिखा रहे हैं...पर्यावरण को बरबाद कर हम कभीभी प्रगती के रास्तेपे चल सके हैं? क्या निसर्ग हमें, उसके साथ खेल करनेकी सज़ा नही देगा?
आज जोभी ब्लॉग जगत से से जुड़े हुए हैं, उन्हें नेट की सुविधा कमोबेश उपलप्ध है...आप गूगल सर्च मे जायें और चुनावों के अधिकारोंके बारेमे पता करें...सिर्फ़ इतनाही नही, मुम्बईमे हुए बम धमाकों के बादसे आजतक मै चीन्ख़ चीन्ख़ के कह रही हूँ...उठो लोगो...और अपने १५० साल पुराने कानून बदलो...उठो वरना यही कानून हमें निगल जायेंगे...ये कानून अंग्रेजों ने अपनी सुविधाके लिए, अपने बचाव के खातिर बनाये थे..आज हमारे नेता और आतंकवादी उसके तहेत बचके निकल रहे हैं...हमारी न्याय व्यवस्था पुरातन हो चुकी है..उठो और PIL दाखिल करो.....
और एक बात कहूँगी...क्या हमारे राजनेता हमारेही माँ-बेहनोंके जाए नही? कहीँ बाहरसे बुलाये गए हैं? तो इनपे संस्कार किसने किए? कहीँ हमारी पारिवारिक व्यवस्था इसके लिए ज़िम्मेदार नही? हम हमारी औलादको क्या संस्कार देते हैं? एक अच्छे नागरिकत्व के ? एक अच्छे भारतीयत्व के या सिर्फ़ अपने आपको हिंदू या मुसलमान समझनेके? ज़रा अंतर्मुख होके तो देखें.....!
एक और लेख है मेरा, "ललितलेख" इस ब्लॉग पे...." प्यारकी राह दिखा दुनियाको"...बड़ी शुक्रगुजार रहूँगी गर भडासी इसे पढ़ें....
आप लोगों से गुहार करती हूँ, कि मेरा लेख," एक गज़ब कानून", और उसपे आधारित," कब होगा अंत" ये कहानी पढ़ें...अगर इस कानून की जानकारी आपको झकझोर नही देती तो फिर मै आगे कुछ नही कहना चाहूँगी....
आपकी खैर ख्वाह
शमा

शमा जी,अच्छा किया आपने अपने मन के उद्गार बाहर निकालने की राह चुनी। यहाँ आपको बहुत से मित्र मिलेंगे,जो आपकी बात समझेंगे भी,सलाह भी देंगे व कभी कभी आपको आपकी किसी सोच को बदलने को भी उकसाएँगे। सबसे बड़ी बात यह है कि जब हम अपनी सोच को लिखित शब्दों में उड़ेलते हैं तो बहुत सी बातें अपने आप ही हमें अधिक साफ होकर नजर आने लगती हैं। यहाँ आकर हमें यह भी महसूस होता है कि दुख में हम अकेले नहीं हैं,सब हमारे साथ हैं और हम अकेले दुखी नहीं हैं। सुख में भी हमारी खुशी में खुश होने वाले बहुत से मिल जाते हैं।
आपका यहाँ स्वागत है।
घुघूती बासूती
माँ का ममत्व-बहुत बढ़िया लिख रहीं हैं आप-हमें इन्तजार रहता है आपके लेखन का.
हम तो खैर हमेशा से इस बात के खास पक्षधर रहे है की साहित्य लेखन हो या गैर पेशेवर लेखन हो बस पढने वाले को उससे जुडाव महसूस होना चाहिए ..ओर उसकी ढेर सारी खासियत आप में नजर आती है....लिखती रहे....