गुरुवार, 23 अप्रैल 2009

रोयीं आँखें मगर...२

रोई आँखे मगर....2

दादा मेरे साथ खूब खेला करते थे। वो मेरे पीछे दौड़ते और हम दोनों आँखमिचौली खेलते। मैं पेडोंपे चढ़ जाया करती और वो हार मान लेते। सायकल चलाना उन्ह्नोनेही मुझे सिखाया और बादमे कारभी.....और सिखाई वक्त की पाबंदी, बडोंकी इज्ज़त करना और हमेशा सच बोलना, निडरता से सच बोलना। बाकी घरवालोनेभी यही सीख दी। हम गलतीभी कर बैठते, लेकिन उसे स्वीकार लेते तो डांट नही बल्कि पीठ्पे थप-थपाहट मिलती। निडरता से सच बोलनेकी सीखपे चलना मुश्किल था। कई बार क़दम डगमगा जाते, झूठ बोलके जान बचा लेनेका मोह होता, लेकिन हमेशा दादा याद आते,उनके बोल याद आते की जब कोई इंसान मृत्युशय्या पे हो तो उसके दिलमे कोई पश्चाताप नही होना चाहिए।
इसी बातपे मुझे बचपन की एक घटना याद आयी। हम तीनो भाई-बेहेन स्टेट ट्रांसपोर्ट की बस से स्कूल आया जाया करते थे। एक दिन माँ ने हिदायत देके स्कूल भेजा मुझे की शामको शायद हमारी कार शेहेर आयेगी। अगर एक विशिष्ट जगह्पे कार दिखे तो छोटे भाईको बस स्टेशन पे ठीक से देख लेना तथा उसे साथ लेके आना। ना जाने क्यों, उस भीड़ भरी जगह्पे मैंने बोहोतही सरसरी तौरसे नज़र दौडाई और कारमे बैठ के घर आ गयी। माँ के पूछ्नेपे कहा की, मैंने तो ठीकसे देखा, राजू वहाँ नही था। माँ को शंका हुई की कही बेटा किसी बुरी संगतमे तो नही पड़ गया??जब देर शाम भाई बस से घर लौटा तो माँ ने उससे सवाल किया की वो शाम को बस स्टेशन पे नही था ...कहाँ गया था??उसने बताया की, वो तो बस स्टेशन पे ही था। माने उसे चांटा लगाया। उसने मासे कहा,"माँ तुम चाहो तो मुझे मारो,लेकिन मैं वहीं पे था...बल्कि मैंने दीदी को देखाभी....इससे पहले की मैं उनतक जाता,वो चली गयी...."। माने मेरी तरफ़ मुखातिब होके कहा,"तुमने राजूको ठीकसे देखा था?"
मेरी निगाहें झुक गयी। मुझे अपने आपपे बेहद शर्मिन्दगी महसूस हुई। आजभी जब वो घटना याद आती है तो मेरी आँखें भर आती हैं।
एकबार दादा से रूठ्के मैं पैदलही स्कूल निकल पडी। तब मेरी उम्र होगी कुछ दस- ग्यारह सालकी। स्कूल तकरीबन आठ किलोमीटर दूर था। दादाजीने अपनी सायकल उठायी और मेरे साथ-साथ चलने लगे। क़रीब दो-तीन किलोमीटर चल चुके तो एक बस आयी। बसका चालक दादाजीको जानता था। उसने मुझसे बसमे बैठने के लिए खूब मनुहार की ,लेकिन मैं थी की रोती जा रही थी,और अपनी ज़िद्पे अडी हुई थी। अन्तमे दादाजीने उसे जानेके लिए कह दिया। मैं पैदल चलकेही स्कूल पोहोंची।जब शाम मे स्कूल छूटी तो मैं बस स्टेशन के लिए निकल पडी। थोडीही दूरपे एक छोटी-सी पुलियापर दादाजी मेरा इंतज़ार कर रहे थे!!दिनभर के भूके-प्यासे!!बोले,"अब तुझे बसमे बिठाके मैं सायकल से घर आऊँगा।" मुझे आजतक इस बातपे ग्लानी होती है....काश.....काश,मैं इतनी जिद्दी ना बनी होती....!
अपूर्ण

2 टिप्पणियाँ:

Udan Tashtari said...

अच्छा लग रहा है आपके संस्मरण सुनना/ जारी रहें.

mamta said...

कभी-कभी जिंदगी मे ऐसा होता है।

रोयीं आँखें मगर....३

रोई आँखे मगर....3

मुझे गर्मियोंकी छुट्टी की वो लम्बी-लम्बी दोपहारियाँ याद है, जब हम बच्चे ठंडक ढूँढ नेके लिए पलंगके नीचे गीला कपड़ा फेरकर लेटते थे। कभी कोई कहानीकी किताब लेकर तो कभी ऐसेही शून्यमे तकते हुए। चार साढे चार बजनेका इंतज़ार करते हुए जब हमे बाहर निकलनेकी इजाज़त मिलती। मेरी दादीको उनके भाईने एक केरोसीनपे चलनेवाला फ्रिज दिया था। वे हमारे लिए कुछ ठंडे व्यंजन बनाती, उनमेसे एकको "दूधके फूल" कहती। फ्रिजमे दूध-चीनी मिलके जमती और फिर उसे खूब फेंटती जाती, उसका झाग हमारे गिलासोंमे डालती और खालिहानसे लाई गेहुँकी "स्ट्रा" से हम उसे पीते। खेतमे बहती नेहरमे डुबकियाँ लगाते,आमका मौसम तो होताही। माँ हमे आम काटके देती और नेहरपे बनी छोटी-सी पुलियापे बिठा देती। हमलोग ना जाने कितने आम खा जाते!!तब मोटापा नाम की चीज़ पता जो ना थी!!
माँ और दादी हम दोनों बेहनोके लिए सुंदर-सुंदर कपड़े सिया करती। दादी द्वारा मेरे लिए कढाई करके सिला हुआ एक frock अब भी मैंने सँभाल के रखा है!!
छुट्टी के दिन,जैसे के हर रविवार को, माँ आवला, रीठा तथा सीकाकायी से हमारे बाल धोती।फिर लोबानदान मे जलते कोयलोंपे बुखुर और अगर डालके उसके धुएँसे हमारे बाल सुखाती। उसकी भीनी-भीनी खुशबू आजभी साँसोंमे रची-बसी है।

यादोंकी नदीमे जब घिरके हम हिचकोले खाते हैं, तो उसका कोई सिलसिला नही होता। जिस दिन जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु हुई थी, मुझे याद है,उनकी अन्तिम यात्राका आँखों देखा हाल आकाशवाणी पे सुनके मैं जारोज़ार रोई...कमेंटेटर के साथ-साथ...... उस दिन भयानक तूफान आया था। हमारे खेतके पुराने,पुराने पेड़ उखड के गिर पड़े थे, मोटी,मोटी डालें टूट गयी थी, मानो सम्पूर्ण निसर्ग मातम मना रहा हो। ये तूफान पूरे देशमे आया था उस दिन।
औरभी कैसी -कैसी यादें उमड़ रही हैं!!जब कॉलेज की पढाई के लिए मैं गाँव छोड़ शहर गयी तो दादीअम्मा के कंप कपाते होंठ और आँखों से बहता पानी याद आ रहा है।याद आ रही उनकी बताई एक बडीही र्हिदयस्पर्शी बात.....
जब मैं केवल तीन सालकी थी, तब मेरे पिता आन्ध्र मे फलोंका संशोधन करनेके लिए मेरे और माके साथ जाके रहे थे। हम तीनो चले तो गए,लेकिन किसी कारन कुछ ही महीनोमे लौटना पडा।
जब मैं थोडी बड़ी हुई तो दादीअम्मा ने बताया कि, हम लोगोंके जानेके बाद वे और दादाजी सूने-से बरामदेमे बैठ के एक दूसरेसे बतियाते थे और कहते थे अगर ये लोग लौट आए तो मैं मेरी पोती को गंदे पैर लेके पलंग पे चढ़ने के लिए कभी नही गुस्सा करूँगा , ....इन साफ सुथरी चद्दरों से तो वो छोटे-छोटे, मैले, पैरही भले!!घर के कोने-कोनेसे उसकी किलकारियाँ सुनायी पड़ती हैं.....!!!
क्रमशः

बुधवार, 22 अप्रैल 2009

रोयीं आँखें मगर....४

रोई आँखे मगर.....4

दादीअम्मा जब ब्याह करके अपनी ससुराल आई,तो ज्यादा अंग्रेज़ी पढी-लिखी नही थी, लेकिन दादाके साथ रहते,रहते बेहद अच्छे-से ये भाषा सीख गयीं। इतनाही नही, पूरे विश्वका इतिहास-भूगोलभी उन्होंने पढ़ डाला। हमे इतने अच्छे से इतिहास के किस्से सुनाती मानो सब कुछ उनकी आँखोंके सामने घटित हुआ हो!
उनके जैसी स्मरण शक्ती विरलाही होती है। उर्दू शेरो-शायरीभी वे मौका देख, खूब अच्छे से कर लेती। दादा-दादी मे आपसी सामंजस्य बोहोत था। वे एकदूसरे का पूरा सम्मान करते थे और एक दूसरेकी सलाह्के बिना कोई निर्णय नही लेते।
जब मैने आंतर जातीय ब्याह करनेका निर्णय लिया तो, एक दिन विनय के रहते उन्होंने मुझे अपने पास लेकर सरपे हाथ फेरा और सर थपथपाया........ मानो कहना चाह रहे हों, काँटा भी ना चुभने पाये कभी, मेरी लाडली तेरे पाओंमे, और तब मैने चुनी राह पर कितने फूल कितने काँटें होंगे,ये बात ना वो जानते थे ना मैं! फ़िर उन्होंने विनयजीका हाथ अपने हाथोंमे लिया और देर तक पकड़े रखा, मानो उनसे आश्वासन माँग रहे हों कि, तुम इसे हरपल नयी बहार देना........

मेरी दादी badminton और लॉन टेनिस दोनों खेलती थीं। एक उम्र के बाद उन्हें गठियाका दर्द रेहनेके कारण ये सब छोड़ना पडा। मेरे ब्याह्के दो दिन पहले मैने हमारे पूरे खेतका एक चक्कर लगाया था। वहाँ उगा हर तिनका, घांसका फूल, पेड़, खेतोंमे उग रही फसलें मैं अपने ज़हेन मे सदाके लिए अंकित कर लेना चाहती थी। लौटी तो कुछ उदास-उदास सी थी। दादीअम्माने मेरी स्थिती भांप ली। हमारे आँगन मे badminton कोर्ट बना हुआ था। मुझसे बोलीं,"चल हम दोनों एकबार badminton खेलेगे।"
उस समय उनकी उम्र कोई चुराहत्तर सालकी रही होगी। उन्होंने साडी खोंस ली, हम दोनोने racket लिए और खेलना शुरू किया। मुझे shuttlecock जैसे नज़रही नही आ रहा था। आँखोके आगे एक धुंद -सी छा गयी थी।हम दोनोने कितने गेम्स खेले मुझे याद नही, लेकिन सिर्फ़ एक बार मैं जीती थी।

उनमे दर्द सहकर खामोश रेहनेकी अथाह शक्ती थी। उनके ग्लौकोमा का ओपरेशन कराने हम पती-पत्नी उन्हें हमारी पोस्टिंग की जगाह्पे ले आए। वहाँ औषध -उपचार की बेहतर सुविधाएँ उपलब्ध थी। दादी की उम्र तब नब्बे पार कर चुकी थी, इसलिए सर्जन्स उन्हें जनरल अनेस्थिशिया नही देना चाहते थे। केवल लोकल अनेस्थेशिया पे सर्जरी की गयी। मेरे पतीभी ऑपरेशन थिअटर मे मौजूद थे। दादीअम्माने एक दो बार डॉक्टर से पूछा ,"और कितनी देर लगेगी?"
डॉक्टर हर बार कहते,"बस, और दस मिनिट्स..."
अंत मे वो बोली,"आप तो घंटें भरसे सिर्फ़ दस मिनिट कह रहे हैं!!"

खैर, जब ऑपरेशन पूरा हुआ तो पता चला कि , लोकल अनेस्थिशिया का उनपे कतई असर नही हुआ था! सर्जन्स भी उनका लोहा मान गए। जब दूसरी आँख की सर्जरी थी तब भी वे मुझसे सिर्फ़ इतना बोली,"बेटा, इस बार जनरल अनेस्थिशिया देके सर्जरी हो सकती है क्या? पहली बार मुझे बोहोत दर्द हुआ था"!
बस, इसके अलावा उनको हुई किसी तकलीफ का उन्होंने कभी किसी से ज़िक्र नही किया।
क्रमशः

2 टिप्पणियाँ:

ajay kumar jha said...

shama jee,
sadar abhivaadan. aaj pehlee baar hee apko padhaa aur yakeen maaniye apne kafee prabhaavit kiya . likhtee rahein

Udan Tashtari said...

जारी रहिये, पढ़ रहे हैं.

रोई आँखें मगर...५ (अन्तिम)

रोई आँखें मगर....5

मेरे ब्याह्के कई वर्षों बाद एक बार मैं अपने मायके आई थी कुछ दिनोके लिए। शयनकक्ष से बाहर निकली तो देखा बैठक मे दादाजी के साथ एक सज्जन बैठे हुए थे। दादा ने झट से कहा,"बेटा, इन्हे प्रणाम करो!'
मैंने किया और दादाजी से हँसके बोली,"दादा अब मेरी उम्र चालीस की हो गई है! आप ना भी कहते तो मैं करती!"
दादा कुछ उदास,गंभीर होके बोले,"बेटा, मेरे लिए तो तू अब भी वही चालीस दिनकी है, जैसा की मैंने तुझे पहली बार देखा था, जब तुझे लेके तेरी माँ अपने मायके से लौटी थी....!!"
मेरे दादा -दादी गांधीवादी थे। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम मे भाग लिया था तथा जब गांधीजी ने युवा वर्ग को ललकारा की वे ग्राम सुधार मे तथा ग्राम जागृती मे लग जाएं, तो दोनों मुम्बई का मेहेलनुमा,संगेमरमर का पुश्तैनी मकान छोड़ गाँव आ बसे और खेती तथा ग्राम सुधार मे लग गए। गाँव मे कोई किसी भी किस्म की सुविधा नही थी। दोनों को जेलभी आना जाना पड़ता था, इसलिए उन्होंने उस ज़मानेमे परिवार नियोजन अपनाकर सिर्फ़ एकही ऑलाद को जन्म दिया, और वो हैं मेरे पिता। मुझे मेरे दादा-दादी पे बेहद गर्व रहा है। उन्हें लड़कीका बड़ा शौक़ था। मेरे जन्म की ख़बर सुनके उन्हों ने टेलेग्राम वालेको उस ज़मानेमे, खुश होके १० रुपये दे दिए!!वो बोला ,आपको ज़रूर पोता हुआ होगा!!
उनके अन्तिम दिनोंके दौरान एकबार मैं अपने पीहर गयी हुई थी। अपनी खेती की जगह जो एकदम बंजर थी(उसके छायाचित्र मैंने देखे थे),उसको वाकई उन्होंने नंदनवन मे परिवर्तित कर दिया था। एक शाम उन्होंने अचानक मुझसे एक सवाल किया,"बेटा, तुझे ये जगह लेनेका मेरा निर्णय कैसा लगा?"
ना जाने मेरे दिलमे उस समय किस बातकी झुन्ज्लाहट थी,मैं एकदमसे बोल पडी,"निर्णय कतई अच्छा नही लगा, हमे स्कूल आने जाने के लिए कितने कष्ट उठाने पड़ते थे, और...."ना जाने मैंने क्या-क्या बक दिया। वे बिलकूल खामोश हो गए। मुझे तुरंत उनकी क्षमा मांगनी चाहिए थी, लेकिन मैंने ऐसा नही किया...

दूसरे दिन मैं वापस लौट गयी। उन दिनों हमलोग मुम्बई मे थे। बादमे मैंने सोचा, उन्ह्ने एक माफी का ख़त लिख दूँगी.... लिखा भी.... लेकिन पोस्ट किया उसी दिन उनके देहान्तकी ख़बर आयी..... जिस व्यक्ती ने मेरे लिए इतना कुछ किया था, उसी व्यक्ती को मैंने उनके अन्तिम समयमे ऐसे कटु शब्द सुना दिए! क्या हासिल हुआ मुझे!मैं अपनी ही निगाहोंमे ख़ुद गिर गयी.....

जबतक हमलोग मेरे पीहर पोहोंचे, उनकी अर्थी उठ चुकी थी। वे बेहद सादगी से अपना अन्तिम कार्य करना चाहते थे। अपने लिए खादी का कफ़न दोनोहीने पहलेसे लेके रखा हुआ था.....
पर जब शेहेर और गाँव वालों को उनके निधन की वार्ता मिली, तो सैकडों लोग इकट्ठा हो गए। हर जाती-पाती के लोगोंने कान्धा दिया। एक नज्म है,"मधु" के नामसे लिखनेवाले शायर की, जो दादी सुनाया करती थी,"मधु"की है चाह बोहोत, मेरी बाद वफात ये याद रहे,खादीका कफ़न हो मुझपे पडा, वंदेमातरम आवाज़ रहे,मेरी माता के सरपे ताज रहे"।
उनकी मृत्यु जिस दिन हुई, वो उनकी शादी की ७२वी वर्ष गाँठ थी। जिस दिन उन दोनों का सफर साथ शुरू हुआ उसी दिन ख़त्म भी हुआ.....
मेरी दादी के मुँह से मैंने, उनकी अपनी जिन्दगीके बारेमे कभी कोई शिकायत नही सुनी। मेहेलसे आ पोहोंची एक मिट्टी के घरमे, जहाँ पानी भी कुएसे भरके लाना होता था......ना वैद्यकीय सुविधाएँ,ना कोई स्कूल,ना बिजली....अपने इकलौते बेटेको सारी पढाई होने तक दूर रखना पड़ा। उन्हें राज्यसभाका मेंबर बननेका मौक़ा दिया गया,लेकिन उन्होंने अपने गाँव मेही रहना चाहा।
दादाजी के जानेके बाद दो सालके अन्दर-अन्दर दादी भी चल बसी। जब वे अस्पतालमे थी, तब एकदिन किसी कारण, ५/६ नर्सेस उनके कमरेमे आयी। उन्होंने दादी से पूछा," अम्मा आपको कुछ चाहिए?"
दादी बोली," मुझे तुम सब मिलके 'सारे जहाँसे अच्छा,हिन्दोस्ताँ हमारा',ये गीत सुनाओ!"

सबने वो गीत गाना शुरू किया। गीत ख़त्म हुआ और दादी कोमा मे चली गयी। उसके बाद उन्हें होश नही आया।

इन दोनोने एक पूरी सदी देखी थी। अब भी जब मैं पीहर जाती हूँ तो बरामदेमे बैठे वो दोनों याद आते हैं। एक-दूजे को कुछ पढ़ के सुनाते हुए, कभी कढाई करती हुई दादी, घर के पीतल को पोलिश करते दादा.....मेरी आँखें छलक उठती हैं....जीवन तो चलता रहता है....मुस्कुराके...या कभी दिलपे पत्थर रखके,जीनाही पड़ता है....
पर जब यादें उभरने लगती हैं,बचपनकी,गुज़रे ज़मानेकी तो एक बाढ़ की तरह आतीं हैं.....अब उन्हें रोक लगाती हूँ, एक बाँध बनाके।
समाप्त

4 टिप्पणियाँ:

PD said...

dil ko chhoo lene vali rachana..

अनिल रघुराज said...

लिखते रहिए। ऐसे अनुभवों को सामने लाना जरूरी है। बहुतों को अपना अतीत याद आएगा, किस्से याद आएंगे, हकीकत याद आएगी। अच्छा लिखा है।

DR.ANURAG said...

सच्चे दिल से लिखी हुई एक रचना ..जिसमे आपके अहसास बखूबी झलकते है...लिखती रहे.....

Udan Tashtari said...

पूरे बहाव के साथ बहे पूरी श्रृंख्ला में. जीवन तो चलता रहता है-बस यही मूल मंत्र है.

भारतीय बुनकरोंकी धरोहर....

अनुपम अग्रवाल ने कहा…

sunder

shama ने कहा…

Aap donoka dhanyawaad ! Kuchh roz pehle mainehi apnee kuchh pics nikalwaake leen....in bunkaron se kapdaa yaa sadiya muddatonse khareedtee rahee hun...socha ki un wastroko pesh karun...jitne log dekh sakte hain dekhen ki hamaaree bunaayee kitnee behtareen hai....keval wastron ke pics deke utnaa asar nahee hota jitna ki unhen pehenke....Warna ham visualise kayee baar nahee kar sakte...!Inhen protschahan dena behad zarooree hai !

NirjharNeer ने कहा…

sundar ati sundar

भारतीय बुनकरोंकी धरोहर .....

बुनकरोंकी धरोहर

मैं पिछले कुछ अरसेसे विविध NGOs के साथ मिलके काम कर रहीं हूँ। और कुछ नहीं तो कमसे कम लोक जाग्रुतिका। दुनियामे हमारे बुनकर बेमिसाल हैं। आज हालत ऐसे हो गए हैं, की लोकाश्रयके अभावसे इनपे आत्महत्या की बारी आ गई है। कई बुनकर पिछले ५/६ वर्षोंमे आर्थिक परेशानीके रहते भारतने खो दिए हैं। इन बुनकर तथा हाथसे कढाई करनेवाले अन्य कारीगरों के लिए कई सेवाभावी संस्थाएँ काम कर रहीं हैं। उनमेसे कुछ बेहतरीन कार्य कर रहीं हैं। मिसालके तौरपर SEWA( self employed women's association), दस्तकार, बनास क्राफ्ट , पारम्पारिक टेक्सटाइल, पारम्पारिक कारीगर, कलारक्षा और अन्य कई। मैंने शुरुआत तो ख़ुद अपनेसे की और कई बरसों से उसे अमल्मे ला रही हूँ। अपना कपडा या अन्य वस्त्र तथा जोभी वस्तुएँ ऐसे प्रदर्शनियों मे उपलब्ध होती हैं, मै कभी बड़ी दुकानों से इनकी ख़रीदारी नही करती। सीधा कारीगारसे ख़रीदना चाहती हूँ। मक़सद ये की, उस वस्तू से होनेवाला मुनाफ़ा सीधे उनके हाथ जाय और वे प्रोत्स्ताहित हों। यही वजह है की बरसों से मै केवल हाथ करघेसे बुने वस्त्र पेहेनती आयी हूँ। ऐसीही साडियों मे ली कुछ तस्वीरें यहाँ पोस्ट कर रहीं हूँ। बताना चाहती हूँ, कि कितनी बेमिसाल बुनाई है ये ! केवल सस्ते कपडेके चक्करमे हम परदेसी बुनत का कपडा ना खरीदें, ये मेरी हर किसी से हाथ जोडके बिनती है। और सच पूछो तो ये बुनकर इतना सस्ता बेचते हैं, की उनपे रेहेम आ जाता है ! मै ख़ुद जानती हूँ कि हाथ करघेको बुनाई के लिए तैयार करनेमे कितना समय लगता है...इतना समय बुनाई मेभी नही लगता...उसपे अगर कढ़ाई हो तो सोचिये और कितनी मेहनत लगती होगी !जानकारी की वजह ये कि हाथसे कढ़ाई मै खुदभी करती हूँ !
अन्यत्र " फायबर आर्ट", इस शीर्षक के तहेत, कुछ ऐसी तस्वीरें भी पोस्ट करने जा रही हूँ, जहाँ मेरी कलाके कुछ नमूने सादर किए हैं। 4 टिप्पणियाँ

4 टिप्पणियाँ:

अजित वडनेरकर ने कहा…

अच्छी पोस्ट ।

NirjharNeer ने कहा…

aapka pyiyas sarahneey hai
aap ek prakashpunj ki tarah andheron ko roshni se nahlane ka kaam kar rahii hai ..is kaam mai bhagvaan aapki madad kare har kadam par
apne blog ka background color change karengii to or accha lagega its my opnion ho sakta hai galat ho.

nitin patel ने कहा…
यह पोस्टलेखक के द्वारा निकाल दी गई है.
nitin patel ने कहा…

mainstream se alag mere shahar ke bunkaro ke liye maine bhi kai stories likhi but aapke article se kuch or idia mila hai thanks for such a wonderful article
pls remove word varification

मै दुआ करती हूँ...

Sunday, April 19, 2009

"The light by a lonely path".. शमा

कुछ ऐसे निजी वजूहात बने कि, मुझे अपनी श्रीन्ख्लासे काफी कुछ डिलीट करना पडा...अज़ीज़ और काबिल पाठक दोस्तों से माफ़ी चाहती हूँ...उन्हें एक फैसला करनेकी गुहार की थी...उसे तो ख़ुद मैनेही अपने आपको सुना दिया.... चंद ग़लत फेहमियों के रहते, सबने मौन रखना बेहतर समझा होगा.......
मै तो केवल अपने बच्चों की परवरिश को लेके चर्चा कर रही थी...के न सिर्फ़ अपने माता पिताके या अन्य परिवारके सदस्यों के बर्ताव का औलाद पे असर होता है, बल्कि, जड़ें माता-पिताके बचपनमे और उसके पूर्व तक चली जाती हैं....
मालिका लिखते, लिखते, कई सारे राज़, ख़ुद मेरे आगे उजागर होते गए....पाठक गर सवाल ना पूछते, तो मै इतनी गहरायी तक आत्मनिरीक्षण नही कर पाती...अंतमे हर उस रेहनुमाकी शुक्रगुजार हूँ, जिसने मेरे साथ, साथ ये सफर किया...मुझे नही मालूम, के अब भविष्य में मुझे अपनी जिंदगीके इतने निजी पन्ने खोलनेका मौक़ा मिलेगा या नही....उन अज़ीज़ पाठकों से रु-ब-रु हो पाऊँगी फिर कभी...?शायद नही....मेरे हालात अब और इजाज़त नही देंगे....जिन हालातों से गुज़रते हुए मालिका लिखी, उनसे फिर एकबार रु -ब-रु होना, मेरी शक्ती और साहसके परे है....अब एक लक्ष्मण रेखा खिंच गयी है...और येभी बताती चलूँ..के मैंने "The light by a lonely path" इस ब्लॉग पे लिखना बंद कर दिया है...
या ऐसे कहूँ, जो पहलेभी कहा था," अब सेहर होनेको है,
ये शमा बुझनेपे है,
जो रातमे जलते हैं,
वो सेहर कब देखते हैं?"

कोईभी "शमा" ना ख़ुद होके जलती है, ना ख़ुद होके बुझती है.....उसके अंधेरोंमे कोई शामिल नही, और उजालों में उसकी ज़रूरत नही....हर सुबह का तारा, पैगाम लेके आता है, उसे बुझानेका समय जताता है....
मै, शमा, दुआ करती हूँ, कि आप सभीकी राहें हमेशा रौशन रहेँ...चिरागों के मेले लगते रहेँ....कोई एक शमा जले या बुझे, फर्क नही, जिंदगीके उजाले उसपे मुनहसर ना रहेँ....

समाप्त।